SASHASTRA SENAON MEIN MAHILA ADHIKARI
सशस्त्र सेनाओं में महिला अधिकारी
ब्रिगेडियर चितरंजन सावंत, वी.एस.एम
यह सोचकर मुझे आश्चर्य होता है कि आधुनिक भारतीय सेना में महिला अधिकारियों का प्रवेश सन् 1992 में ही क्यों प्रारंभ हुआ। इससे पहले क्यों नही हुआ। यदि हम प्राचीन भारत के इतिहास पर दृश्य डालें तो हमें अनेक दृश्टांत ऐसे मिलेंगे जहां रणभूमि में महिला योद्धाओं ने सक्रीय योगदान दिया। राजा दशरथ की रक्षा रणभूमि में रानी कैकेयी ने अपने रणकौशल से की। अंग्रेज़ों के चंगुल से भारत को मुक्त कराने में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और दक्षिण भारत में कित्तुर की रानी चेन्नमां के नाम उल्लेखनीय हैं। मध्य काल में संभवत् मध्य एशिया और मध्य पूर्व एशिया की पर्दा परक संस्कृति के प्रभाव में भारतीय महिलाओं को घर की चार दीवारी में ताला बंद कर दिया। रणकौशल सीखने की बात कौन कहे, सामान्य शिक्षा से भी वे विमुख हो गईं। भारत को निर्बल बनाने में महिलाओं के योगदान का अभाव नेतृत्व वर्ग को खटकता तो रहा किंतु कोई प्रभावशाली परिवर्तन नहीं लाया जा सका।
सैन्य शिक्षा की चाह और सशक्त मांग
दूसरे विश्वयुद्ध नें यह साबित कर दिया कि जब किसी समाज में हताहत होने के कारण पुरूषों की कमी हो जाती है तो उनका स्थान महिलाओं द्वारा लिया जाना स्वाभाविक हो जाता है। इसका बहुत बड़ा उदाहण सोवियत संघ रहा है। जर्मनी के भयंकर आक्रमण में बहुत बड़ी संख्या में पुरुष हताहत हुए। उनका स्थान लिया सोवियत महिलाओं ने। वे न केवल नगरों में बड़े बड़ें टैक और ट्रक चलाती थीं बल्कि सैन्य प्रशिक्षण केंद्रों में प्रशिक्षक भी बनती थीं। आवश्यकता पड़ने पर रणभूमि में युद्ध भी करती थीं। यही परंपरा इज़रायल की सशस्त्र सेनाओं में रही और फिर क्या अमेरीका और क्यो यूरोपीय देश - सभी नें इसे अपनाया।
स्वतंत्रता के 45 वर्ष बाद भारतवर्ष भी अपनी महिला शक्ति के प्रति जागरूक हुआ। 1992 में महिला कडेट अल्प अवधि के प्रशिक्षण के बाद अल्प कालिक कमीशन प्राप्त करके सेना में अधिकारी बनीं। एक बार जब गाड़ी चल पड़ी तो गति भी पकड़ती गई। महिला अधिकारियों ने कोर ऑफ इंजीनियर्स, कोर ऑफ सिग्नल्स, ई एम ई, सेना शिक्षा कोर एवं जैग शाखा (सेना का कानून विभाग) आदि में अच्छा कार्य किया और ख्याति प्राप्त की।महिला अफसरो की यह भी मांग थी कि उन्हे स्थाई कमीशन दिया जाए। भारत सरकार ने तीनो सशस्त्र सेनाओं की एक समिति गठित की जिसनें सन् 2006 में यह संस्तुति की, कि ऐसे सैन्य अंग जहां महिला अधिकारी शत्रु के अत्यंत निकट जाकर युद्ध करें को छोड़ कर अन्य विभागों जैसे सेना शिक्षा कोर और जैग विभाग में उन्हे स्थाई कमीशन दिया जा सकता है। 26 सितंबर 2008 को भारत सरकार नें यह महत्वपूर्ण निणर्य लिया कि जो महिला अधिकारी और पुरुष अधिकारी जो शॉर्ट सर्विस कमीशन प्राप्त कर चुके हैं और 10 से 14 वर्ष की सैन्य सेवा में खरे साबित हुए हैं उन्हे स्थाई कमीशन दिया जा सकता है। सशस्त्र सेनाओं में महिला अधिकारियों के सशक्तिकरण की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम था। इससे महिला अधिकारियों की भागीदारी का दायरा भी बहुत बढ़ गया।
आईए हम यह देखें कि सशस्त्र सेनाओ में महिला अधिकारियों की संख्या कब और कितनी रही -
क) सबसे पहले मिलिट्ररी नर्सिंग सर्विस में महिला अधिकारियों की भर्ती 1927 में की गई।
ख) दूसरे विश्व युद्ध में बहुत बड़ी संख्या में सर्जन की आवश्यकता पड़ी तो यह निर्णय लिया गया कि आर्मी मेडिकल कोर में भी महिला डॉक्टरों की भर्ती की जाए। ऐसा 1943 में आरंभ किया गया।
ग) सेना के अन्य नॉन कौंबेट विभागों में जिनकी चर्चा पहले भी की जा चुकी है – 1992 से महिला अधिकारियों की भर्ती आरंभ हुई। इस समय थल सेना में 1,072 महिला अधिकारी (सेना महिला डॉक्टरों के अतिरिक्त) कार्यरत हैं।
घ) भारतीय नौसेना में केवल 258 महिला अधिकारी हैं जिन्हें अपने कार्य के लिए केवल तट पर ही तैनात किया जाता है। युद्ध पोत की बनावट के कारण उन्हे वहां तैनात नहीं किया है। यह बात अवश्य है कि अन्य विकसित देशों में महिला अधिकारी भी युद्धपोत पर तैनात की जाती हैं। भारत को भी वैसे ही करना चाहिए अन्यथा यह लिंग आधारित भेदभाव माना जाएगा।
ङ) भारतीय वायुसेना में इस समय 793 महिला अधिकारी (डाक्टरो के अतिरिक्त) तैनात हैं। यह हर्ष की बात है कि 63 महिला अधिकारी उड़ान शाखा में कार्यरत हैं जो मालवाहक विमान और हेलीकाप्टर उड़ाती हैं। इस संदर्भ में यह खेद की बात भी है कि अभी तक महिला अधिकारियों को लड़ाकू विमान उड़ाने का प्रशिक्षण नहीं दिया जा रहा है। हाल में वायुसेना अध्यक्ष ने यह आश्वासन ज़रूर दिया है कि इस दिशा में शीघ्र ही सक्रीय कदम उठाया जा सकता है।
महिला अधिकारियों की संख्या वृद्धि
यह भी कहा जाता है कि सशस्त्र सेनाओं ने अपने द्वार महिला अधिकारियों के लिए पूरी तरह से नहीं खोलें हैं। महिला अधिकारी सेना की वर्दी तो पहनीं हैं, शस्त्र संचालन का प्रारंभिक प्रशिक्षण भी पाती हैं किंतु युद्ध क्षेत्र में नही जा सकती। दूर से भी शत्रु पर गोलाबारी करना उनके कर्तव्य क्षेत्र से बाहर माना जाता है। महिला अधिकारियों का विचार है कि यह बात लिंग परक भेद भाव है। यदि इज़रायल रूस और अमेरीका की नारियां अपने अपने देश के शत्रुओं को युद्ध में धराशायी कर सकती हैं तो भारत की महिलाएं क्यों नही कर सकतीं। भारतीय महिलाओं को रणभूमि में जाने की अनुमति न देना उनके साथ अन्याय है। अभी हाल ही में भारतीय संसद की लोक सभा में इस संबंध में श्रीमती सुष्मा स्वराज ने प्रश्न पूछकर समस्या को जगविदित किया। रक्षा मंत्रालय की ओर से उत्तर में यह कहा गया कि इस दिशा में अध्ययन जारी है और भविष्य में भूमिका महिला अधिकारियों की क्या हो, इस पर पुनर्विचार कर फैसला लिया जा सकता है। महिला अधिकारियो का यह कहना सही है कि उन्हे रणरेखा से परे रखना उनकी क्षमता की अनदेखी है और न केवल भावनाओं का अपमान है अपितु इच्छा शक्ति की भी उपेक्षा है।
होनहार महिलाओं का सेना में आने से कतराने का एक कारण यह भी है कि उच्च पद तक पहुंचने के लिए उनके लिए अनेक बाधाएं हैं। बाधाओं की चर्चा करने से पहले उनके भर्ती के आंकड़ो पर एक दृष्टि डालते हैं। सन् 2007 में थल सेना में 398 महिला अधिकारियों ने प्रवेश पाया। सन् 2008 में इस संख्या में केवल 1 की वृद्धि हुई और 399 महिला अधिकारियों ने प्रवेश पाया। सन् 2009 के प्रथम छह महिनों में वद्धि आशा ने अनुरूप हुई और 432 महिला अधिकारियों ने सेना में प्रवेश पाया।
यहां यह चर्चा करना भी आवश्यक है कि महिला अधिकारियों के लिए भर्ती का मापदंड उतना ही ऊंचा है जितना होना चाहिए। तो क्या महिलाओं के विरुद्ध पुरूष अधिकारी कोई भेदभाव बरतते हैं या उनके मन में कोई दुराग्रह है। संसद में रक्षा मंत्री ने स्वयं इस स्थिति से इंकार किया है। फिर भी यदि हम समाचार पत्रों और मीडिया के माध्यमों से मिले समाचार पर दृष्टि डालें तो पाएंगे कि कहीं कहीं महिला अधिकारियों ने यौन उत्पीड़न के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है।
यौन उत्पीड़न की शिकायत
पुरुष अधिकारियों का – जो कि सामान्यत उनके वरिष्ट अधिकारी भी होते हैं – का कहना है कि जब महिला अधिकारियों के विरुद्ध अनुशासन भंग की कार्यवाई की जाती है तो वे अपने बचाव में सबसे पहले यौन उत्पीड़न की शिकायत का सहारा लेती हैं। कहीं कहीं यौन उत्पीड़न की शिकायत सही भी पाई गई है और सेना ने उस पर उचित कार्यवाई भी की है।
इस संदर्भ में आकंड़े भी कुछ कहते हैं। 7 अगस्त 2007 को बीबीसी ने यह समाचार दिया कि भारतीय सेना में सन् 2002 और 2006 के बीच 5 महिला अधिकारियों ने यौन उत्पीड़न के विरूद्ध शिकायत दर्ज कराई है। यौन उत्पीड़न के जो मामले सुर्खियों में रहे हैं उनमें लेह की तीन इंफैंट्री डिविज़न में तैनात एक कैप्टन महिला अधिकारी का उसी डिविज़न के मुखिया – एक मेजर जनरल रैंक के वरिष्टम अधिकारी ने यौन शोषण किया। महिला अधिकारी की शिकायत पर उस अधिकारी का कोर्ट मार्शल किया गया और उसे सेना से निकाल दिया गया। ऐसे भी मामले देखने में सामने आए हैं जहां किसी किसी महिला अधिकारी ने तंग आकर आत्महत्या भी कर ली। सेना का दावा है कि उन सभी मामलों में उचित कार्यवाही की गई और न्याय प्रणाली का पालन किया गया।
भारत की सशस्त्र सेनाओ में महिला और पुरूष अधिकारी कंधे से कंधा मिलाकर कार्य करें और अपने दिए हुए कर्तव्य के पालन में लिंग भेद न आने दें, न इस बात का सहारा लें कि कोई शारीरिक रूप से उतना सक्षम नही है कि वो कठिन कार्य कर सके, तो महिला अधिकारियों की मांग बढ़ती रहेगी और उनके लिए सेना में नए नए द्वार खुलते रहेंगे।
ब्रिगेडियर चितरंजन सावंत, वीएसएम
उपवन
609, सेक्टर 29
नोएडा – 201303. भारत
फोन – 9811173590
ईमेल – sawantg.chitranjan@gmail.com
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AUM Aadarniy Anand Bakhshi
AUM
Aadarniy Anand Bakhshi Ji. Namaste.
Main aap se puri trah se sahmat hoon. Prayas kiya jaa raha hai ki Mahila adhikariyon ko woh sabhi yudh bhumi mein avasar pradaan kiye jayen jo purush adhikariyon ko uplabdh hain.
Sambhavtah samay adhik lagega.
Sasneh,
Chitranjan Sawant
जब महिलाएँ
जब महिलाएँ इस देश की राष्टृपति व प्रधानमन्त्री बनाई जा सकती हैं, तो उनके साथ यह अन्याय क्यों किया जा रहा है ? क्या वे किसी से कम हैं ? उन्हें पूरा पूरा मौका सशस्त्र सेनाओं में आगे बढ़ने का दिया जाना चाहिए ताकि यदि वे चाहें तो झाँसी की रानी बन अपने जोहर दिखा सकें | यह इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि आज की अप् संस्कृति अन्यथा उन्हें निक्कमा बना देगी | उनके हौंसले बुलन्द रखने का यह उत्तम अवसर व उत्तम साधन सिद्ध होगा | एक स्पर्धा की भावना आदमियों में भी फिर से जागेगी जो फिर से एक नई चेत्तना भारतीय सशस्त्र सेनाओं में भर देगी |
ब्रिगेडियर साहब , यह जानकारी भरा लेख आशा है इस दिशा में और अधिक जागरुकता लाने में सहायक होगा |
बहुत 2 धन्यवाद |
आनन्द