महर्षि पतञ्जलि ऋषि प्रणीत 'योगदर्शनम्' द्वितीय साधनपादः (7)

(गतांक से आगे)

वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् ||33||

[वितर्कबाधने] हिंसा आदि योगविरुद्ध आचरणों से बाधा उपस्थित होने पर‌ [प्रतिपक्षभावनम्] विपरीत पक्ष का चिन्तन करना चाहिए |

यम नियमों के विरोध के विरोधी वितर्कों (= हिंसा के विचारों द्वारा योग मार्ग में बाधा उपस्थित होने पर इन वितर्कों के विरोधी विचारों को) उत्पन्न करना चाहिए | अर्थात् मैं हिंसा नहीं करूंगा, मैं असत्य नहीं बोलूंगा इत्यादि विचार बनाने चाहिएँ और ऐसा ही आचरण करना चाहिए |

वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा
दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् ||34||

[वितर्काः] वितर्क [हिंसादयः] हिंसा आदि (यम नियमों के विरोधी विचार) हैं [कृतकारिताSनुमोदिताः] स्वयं किये हुए, अन्य से कराये हुए और समर्थन किये हुए [लोभ-क्रोध-मोहपूर्वकाः] लोभ, क्रोध और मोह रूपी कारण वाले [मृदु-मध्य-अधिमात्राः] थोड़ी, मध्यम और अधिक मात्रा वाले [दुःख-अज्ञान-अनन्तफलाः] अत्यधिक अज्ञान और दुःख जिनका फल है [इति] इस प्रकार [प्रतिपक्ष-भावनम्] विपरीत पक्ष का चिन्तन करें |

वितर्क हिंसा आदि (योग से विरुद्ध आचरण) को कहते हैं | ये हिंसा आदि वितर्क स्वयं किये गये, दूसरे से करवाये गये तथा दूसरों का समर्थन किये जाने के स्वरूप वाले होते हैं | ये लोभ, क्रोध तथा मोह रूपी कारणों से उत्पन्न होते हैं | ये वितर्क मृदु (= कम) मध्य (= मध्यम) और अधिमात्र (= अधिक) मात्रा में किये जाते हैं | ये दुःख तथा अज्ञानरूपी फल देने वाले होते हैं | इस प्रकार इन हिंसा आदि वितर्कों को दुःखदायी समझकर इनकी विरोधी भावना बनानी चाहिए | जैसा कि सूत्र 2/33 में बताया गया है |

अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः ||35||

[अहिंसाप्रतिष्ठायाम्] अहिंसा का आचरण परिपक्व हो जाने पर [तत्सन्निधौ] उस योगी पुरुष के समीप आने पर [वैरत्यागः] वैरभाव छूट जाता है |

अहिंसा धर्म; को यथार्थ रूप में समझकर उसका निश्‍चय पूर्वक आचरण करने वाले साधक के मन से समस्त प्राणियों के प्रति वैरभाव (= द्वेष) छूट जाता है तथा उस अहिंसक साधक के सत्संग एवं उपदेश के अनुसार आचरण करने वाले अन्य व्यक्तियों का भी अपनी अपनी योग्यता के अनुसार वैर भाव छूट जाता है |

सत्यप्रतिष्‍ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् ||36||

[सत्यप्रतिष्‍ठायाम्] सत्य का आचरण परिपक्व हो जाने पर [क्रियाफल-श्रयत्वम्] कर्म, फलरूपी आश्रय वाले हो जाते हैं अर्थात् सफल होते हैं |

जब मनुष्य निश्‍चय करके मन, वाणी तथा शरीर से सत्य को ही मानता बोलता और करता है तो वह जिन जिन उत्तम कार्यों को करना चाहता है वे सब सफल होते हैं |

अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्त्नोपस्थानम् ||37||

[अस्तेयप्रतिष्ठायाम्] पूर्णत‌या चोरी का परित्याग कर देने पर [सर्वरत्न‌-उपस्थानम्] सब उत्तम पदार्थों की प्राप्ति होती है |

जब मनुष्य निश्‍चय करके मनन वाणी तथा शरीर से चोरी छोड़ देता है तब सब उत्तम उत्तम पदार्थ यथायोग्य प्राप्त होने लगते हैं | अर्थात् ईश्‍वर की और से ज्ञान-विज्ञान, बल, आनन्द आदि तथा मनुष्यों की और से भी श्रद्धावश उस योगी को भोजन वस्त्र, धनादि सब प्रकार के पदार्थ प्राप्त होते हैं |

((क्रमशः)

[सरल हिन्दी भाषा में - मूल सूत्र, शब्दार्थ तथा भावार्थ सहित
लेखक - श्री ज्ञानेश्वरार्यः - M.A. दर्शनाचार्य, दर्शन योग महाविद्यालय, आर्यवन, रोजड़, गुजरात के सौजन्य से प्रेषित]

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