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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

प्रार्थना

प्रार्थना
भद्रम नो अपि वातय मन:! ऋग्वेद 10.20.1
हे प्रभु ऐसी परिस्थिति प्रदान करो जिस से हमारा मन कल्याणकारी मार्ग पर अग्रसर हो
भद्रम नो अपि वातय मनो दक्षमुत क्रतुम! ऋग्वेद 10.25.1
हे प्रभु ऐसी परिस्थिति प्रदान करो जिस से हमारा मन कल्याणकारी मार्ग पर प्रेरित करे और हम दक्षता पूर्ण कर्मों से अग्रसर हो
वेदों का उपदेश है कि मनुष्य सदैव अपने शुभ कर्मों से अभ्युदय प्राप्त करता है.

इस विषय पर ऋग्वेद 10.20 से ले कर ऋग्वेद 10.25 तक के, 6 सूक्त ‘वासुको वसुकृद्धा ; सांसारिक साधनों,पार्थिव उपलब्धियों के बारे में हैं इसे अंग्रेज़ी में material conveniences in life कहा जा सकता है.इस शृङ्खला में ऋग्वेद के 10वें मंडल के प्रथम में 20 वें और अंतिम सूक्त 25 का आरम्भ “ भद्रम नो अपि वातय मन:” से होता है. सांसारिक उपलब्धियों को ग्रहण करने में अग्नि- ऊर्जा , सोम -ज्ञान विज्ञान, इन्द्र आत्मा में सस्थापन और यज्ञ का महत्व विषय पर इन सूक्तों से ऋग्वेद का उपदेश मिलता है.

केवल हाथ पर हाथ रख कर बैठ कर स्तुति उपासना ही पर्याप्त नहीं हैं.
हमारे सब संकल्प तभी सिद्ध हो सकेंगे जब हम प्रभु के आशीर्वाद ले कर कर्मठ बनेंगे. जैसा कि यजुर्वेद 40/2 में उपदेश मिलता है
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतॅ समा: !
एवं त्वयि नान्यथेतोSस्ति न कर्म लिप्यते नरे !!
वेद तो मनुष्य को सदैव कर्मठ देखना चाहता है.
सारा जीवन ही तो यज्ञ रूप है. फिर यज्ञों में देवताओं का क्या स्थान बनता है ?
इस सन्दर्भ में देवताओं की क्या भूमिका होती है ?

ऋग्वेद में आया है,
अयं त एमि तन्वा पुरस्ताद्विश्व देवा अभि मा यन्ति पश्चात् !
यदा मह्यं दीधरो भागमिन्द्रा SSदिन्भया कृणवो वीर्याणि !! ऋग्वेद 8‌/100/1

“मैं” (अविनाशी आत्मा) सब से पहले इस शरीर में प्रकट होता हूं. उस के पश्चात विश्व के सारे देवता मेरी ओर चले आते हैं.
जैसे उदाहरण के लिए इन्द्र मेरे सौभाग्य के लिए मुझ में बहुमुखि पौरुष, अदीनता, निर्भयता से आत्मबल धारण कराता है.
अब इन्द्र कौन है यह भी इसी सूक्त में समझाया गया है.

प्र सु स्तोमं भरत वाजयंत इन्द्राय सत्यं यदि सत्यमस्ति !
नेन्द्रो अस्तीति नेम उ त्व आह क ई ददर्शं कमभि ष्टवाम !! ऋग्वेद 8/100/3

हे सम्पन्नता के अभिलाषी मनुष्यो यदि इन्द्र सचमुच में कोई शक्तिवान है तो अवश्य उस की स्तुति कहो. परन्तु नेम:- तर्कशील बुद्धि तो यह कह्ती है कि इन्द्र कर के कोई नही है. और यदि है तो किस ने इसे देखा है ? यदि नही है तो हम किस की स्तुति करें ?

मनुष्य की आत्मा में सत्प्रेरणा दायक शक्तियां जैसे जैसे स्थापित होती हैं वैसे वैसे वह व्यक्तित्व ‘देवत्व’ धारण करने लगता है.

ऐसा प्रतीत होता है कि ऋग्वेद के अनेक सूक्तों के मन्त्र अथर्व वेद में कुछ अधिक समझ में लाने योग्य बना कर पाए जाते हैं . इस प्रकार अनेक गूढ ऋग्वेद के विषयों के मर्म को समझने में अथर्व वेद से बडी सहायता प्राप्त होती है.
आर्य मित्रों से अपने कुछ विचार बांटने का प्रयास कर रहा हूं. यहां प्रथम तो देवता विषय पर कुछ विचार करना होगा. जिसा पर अलग से कुछ लिखा जाएगा.
इसा प्रसन्ग में
निम्न ऋग्वेद और अथर्वेद मंत्र प्रस्तुत हैं

मह्यं यजन्तां मम यानीष्टाकूति: सत्या मनसो मे अस्तु !
एनो मा नि गां कतमच्चनाहं विश्वे देवा अभि रक्षन्तु मेह !!अथर्व5/3/3,ऋ10/128/4

मम- मेरे
यानि इष्टा -जो अभीष्ट सुख दायक पदार्थ हैं वे
मह्यम- मुझे
यजन्ताम्- प्राप्त हों
मे- मेरे
मनस: आकूति: -मन का सन्कल्प
सत्या अस्तु - सत्य सिद्ध हो
अहं -मैं
कतमत् चन -किसी भी
एन:- पाप को
मा निगाम् -न प्राप्त करूं
विश्वे देवा: - सब देवता
इह -यहां
मा अभिरक्षंतु- मेरी रक्षा करें
मेरे अभीष्ट जो सुख दायक पदार्थ हैं वे मुझे प्राप्त हों. मेरे संकल्प सत्य सिद्ध हों.मैं ऐसे कर्म करूं जिन
का फल दुखदायी न हो.

I may be blessed with all that is appropriately desirable for me. My resolutions come true. I commit no transgressions that bring misery to me.

मयि देवा द्रविणमा यजन्तां मय्याशीरस्तु मयि देवा हूति: !
दैवा होतार: सनिषन् ना एतदरिष्टा: स्याम तन्वा सुवीरा: !! अथर्व5/3/5 ,ऋ 10/128/3

देवा:- देवगण
मयि -मेरे लिए
द्रविणम् - धन बल सामर्थ्य
आयजन्ताम्- प्रदान करें
मयि आशी: -मुझ पर मेरे यज्ञों के फल का आशीर्वाद बना रहे
मयि देवहूति: -मुझ मे यज्ञादि मे देवताओं का आह्वान करने की श्रद्धा
अस्तु- बनी रहे
दैव: होतार: -यज्ञ करने वाले होता गण
न एतत् सनिषन्- हमारे समीप हों
तन्वा- शरीर से
अरिष्ट: - निरोग तथा
सुवीरा:- वीर पुत्रों वाले
स्याम - होवें

मुझे धन बल सम्पदा से युक्त हो कर यज्ञादि करने की श्रद्धा सदैव बनी रहे , मुझ में देवताओं का आह्वान करने की शक्ति सदैव बनी रहे, यज्ञादि द्वारा मैं समृद्धि, स्वस्थ शरीर पा कर बलवान बनूं .
I may be blessed with wisdom to perform various Yagyas to obtain health wealth and prosperity in life

दैवी: षडवीरु रु न: कृणोत विश्वे देवास इह मादयध्वम!
मा नो विददभिभा मो अशस्तिर्मा नो विदद् वृजिना द्वेष्या या !! अथर्व 5/3/6

दैवी सम्पदाएं ( पृथ्वी, आकाश, जल, औषधि,दिन और रात्रि) हमारी विस्तृत सम्पदा बन कर हमें आनन्दित करें. हम उन का तिरस्कार करने का पाप न करें
Nature’s six majestic gifts Earth, Atmosphere, Waters, Herbal medicines, Days and Nights should be available as our wealth for our welfare and prosperity. May we never junk them. (Our environment should be free of pollution, pesticides etc.)

मा हास्महि प्रजया मा तनूभिर्मा रधामा द्विषते सोम राजन् !! ऋ10/128/5

हम पुत्रादि सन्तान से वञ्चित न हों , हमारे अहित करने वाले ज्ञानी शत्रु हमारे वश में रहें .

तिस्रो देवीर्महि न: शर्म यच्छत प्रजायै नस्तन्वे3 यच्च पुष्टम् !
मा हास्महि प्रजया मा तनूभिर्मा रधाम द्विषतेसो मा राजन् !! अथर्व 5/3/7

तीनों दैवी सम्पदाएं वाणी,पृथ्वी और सरस्वती हम को प्रचुर सुख प्रदान करें. पुष्टीकारक अन्नादि पदार्थ हमारे स्वास्थ्य, शारीरिक बल , की वृद्धि करें. हम पुत्रादि सन्तान से वञ्चित न हों , हमारे अहित करने वाले ज्ञानी शत्रु हमारे वश में रहें .

Three great blessings the faculties of Speech, Culture of civilization, and Mother Earth, enabled by good rule of law, may provide us and our progenies, with (health, strength and vigor) with good nutrition.

उरूव्यचा नो महिष: शर्म यच्छत्वस्मिन् हवे पुरुहूत: पुरुक्षु !
स न: प्रजायै हर्यश्व मृडेन्द्र मा नो रीरिषो मा परा दा: !! अथर्व 5/3/8 ऋ10/128/8

इस मानव जीवन की रणभूमि में वह परमपिता परमेश्वर हमें और हमारे परिवारों को सुखदायक आवास, आहार से तृप्त रखे और अनिष्टों से सुरक्षित रखें

धाता विधाता भुवनस्य यस्पतिर्देव: सविता भिमातिषाह:!
आदित्या रुद्रा अश्विनोभा देअवा: पांतु यजमानं निरृथात् !! अथर्व 5/3/9. ऋग्वेद 10/128/7
सब का धारक धाता, सब का रचयिता ब्रह्मा और सब भुवनों की पालन कर्ता दैवी शक्तियां, अभिमानक शत्रुओं के विनाश में रुद्र और आदित्य अश्विनी देव जजमान को अनिष्ट कारी पाप से बचाएं.

ये न: सपत्ना अपा ते भवन्त्विन्द्राग्निभ्यामव बाधामह एनान् !
आदित्या रुद्रा उपरिस्पृशो न उग्रं चेत्तारमधिराजमक्रत !! अथर्व 5/3/10
ये न: सपत्ना अप ते भवन्ति न्द्राग्निभ्यामवा बाधामहे तान् !
वसवो रुद्रा आदित्या उपरिस्पृशं मोग्रं चेत्तरमधिराजमक्रन् !! ऋ10/128/9

अपनी आत्मा में अग्नि और इन्द्र के स्थापत्य से हम अपने शत्रुओं को नष्ट करें, रुद्र और आदित्य हमारी चेतना मे स्थापित हो कर हमें , उग्र , बुद्धि से संसार मे प्रतिष्ठित पद पर आसीन करें

अर्वाञ्चमिन्द्रममुतो हवामहे यो गोजिद् धनजिदश्चजिद् य: !
इमं नो यज्ञं विहवे शृणोत्वस्माकमभूर्हर्यश्व मेदी !! अथर्व 5/3/11

इंद्र से प्राप्त सामर्थ्य से हम गोधन, सम्पन्नता से युक्त होने के यज्ञ मे प्ररित रहें. हमें हर्यश्व प्राप्त हों

हर्यश्व से अभिप्राय हरिद् वर्णा अश्व बनता है .आज के युग में यह एक बडा नवीन तम वैज्ञानिक उपदेश है, और सचमुच में बडा विस्मयकारी है.
अश्व शक्ति/ ऊर्जा का प्रतीक है हरिद अश्व प्रकृति में तो नही होता परन्तु, इस का अभिप्राय यहां वेद मे green energy से है. जो आज विश्व का आधुनिक तम चिंतन है. जिस को वेदों में कितनी सरलता से ऋषियों ने प्रस्तुत किया है.

आइए

आइए उपरोक्त हीरे मोती को सम्भाल कर एक बार फिर अपनी झोली में संजो लें | ऐसी सुन्दर प्रार्थनाओं के लिए आचार्य सुबोध जी का कोटिशः धन्यवाद |

प्रार्थना
हे प्रभु ऐसी परिस्थिति प्रदान करो जिस से हमारा मन कल्याणकारी मार्ग पर अग्रसर हो

हे प्रभु ऐसी परिस्थिति प्रदान करो जिस से हमारा मन कल्याणकारी मार्ग पर प्रेरित करे और हम दक्षता पूर्ण कर्मों से अग्रसर हो
वेदों का उपदेश है कि मनुष्य सदैव अपने शुभ कर्मों से अभ्युदय प्राप्त करता है.

इस विषय पर ऋग्वेद 10.20 से ले कर ऋग्वेद 10.25 तक के, 6 सूक्त ‘वासुको वसुकृद्धा ; सांसारिक साधनों,पार्थिव उपलब्धियों के बारे में हैं इसे अंग्रेज़ी में material conveniences in life कहा जा सकता है.इस शृङ्खला में ऋग्वेद के 10वें मंडल के प्रथम में 20 वें और अंतिम सूक्त 25 का आरम्भ “ भद्रम नो अपि वातय मन:” से होता है. सांसारिक उपलब्धियों को ग्रहण करने में अग्नि- ऊर्जा , सोम -ज्ञान विज्ञान, इन्द्र आत्मा में सस्थापन और यज्ञ का महत्व विषय पर इन सूक्तों से ऋग्वेद का उपदेश मिलता है.

केवल हाथ पर हाथ रख कर बैठ कर स्तुति उपासना ही पर्याप्त नहीं हैं |

हमारे सब संकल्प तभी सिद्ध हो सकेंगे जब हम प्रभु के आशीर्वाद ले कर कर्मठ बनेंगे. जैसा कि यजुर्वेद 40/2 में उपदेश मिलता है

वेद तो मनुष्य को सदैव कर्मठ देखना चाहता है. सारा जीवन ही तो यज्ञ रूप है.
फिर यज्ञों में देवताओं का क्या स्थान बनता है ? इस सन्दर्भ में देवताओं की क्या भूमिका होती है ?

“मैं” (अविनाशी आत्मा) सब से पहले इस शरीर में प्रकट होता हूं. उस के पश्चात विश्व के सारे देवता मेरी ओर चले आते हैं.
जैसे उदाहरण के लिए इन्द्र मेरे सौभाग्य के लिए मुझ में बहुर्मुखि पौरुष, अदीनता, निर्भयता से आत्मबल धारण कराता है.
अब इन्द्र कौन है यह भी इसी सूक्त में समझाया गया है.

हे सम्पन्नता के अभिलाषी मनुष्यो यदि इन्द्र सचमुच में कोई शक्तिवान है तो अवश्य उस की स्तुति कहो. परन्तु नेम:- तर्कशील बुद्धि तो यह कह्ती है कि इन्द्र कर के कोई नही है. और यदि है तो किस ने इसे देखा है ? यदि नही है तो हम किस की स्तुति करें ?

मनुष्य की आत्मा में सत्प्रेरणा दायक शक्तियां जैसे जैसे स्थापित होती हैं वैसे वैसे वह व्यक्तित्व ‘देवत्व’ धारण करने लगता है.

मेरे अभीष्ट जो सुख दायक पदार्थ हैं वे मुझे प्राप्त हों. मेरे संकल्प सत्य सिद्ध हों.मैं ऐसे कर्म करूं जिन
का फल दुखदायी न हो.

I may be blessed with all that is appropriately desirable for me. My resolutions come true. I commit no transgressions that bring misery to me.

मुझे धन बल सम्पदा से युक्त हो कर यज्ञादि करने की श्रद्धा सदैव बनी रहे , मुझ में देवताओं का आह्वान करने की शक्ति सदैव बनी रहे, यज्ञादि द्वारा मैं समृद्धि, स्वस्थ शरीर पा कर बलवान बनूं |
I may be blessed with wisdom to perform various Yagyas to obtain health wealth and prosperity in life

दैवी सम्पदाएं ( पृथ्वी, आकाश, जल, औषधि,दिन और रात्रि) हमारी विस्तृत सम्पदा बन कर हमें आनन्दित करें. हम उन का तिरस्कार करने का पाप न करें
Nature’s six majestic gifts Earth, Atmosphere, Waters, Herbal medicines, Days and Nights should be available as our wealth for our welfare and prosperity. May we never junk them. (Our environment should be free of pollution, pesticides etc.)

हम पुत्रादि सन्तान से वञ्चित न हों , हमारे अहित करने वाले ज्ञानी शत्रु हमारे वश में रहें .

तीनों दैवी सम्पदाएं वाणी,पृथ्वी और सरस्वती हम को प्रचुर सुख प्रदान करें. पुष्टीकारक अन्नादि पदार्थ हमारे स्वास्थ्य, शारीरिक बल , की वृद्धि करें. हम पुत्रादि सन्तान से वञ्चित न हों , हमारे अहित करने वाले ज्ञानी शत्रु हमारे वश में रहें .

Three great blessings the faculties of Speech, Culture of civilization, and Mother Earth, enabled by good rule of law, may provide us and our progenies, with (health, strength and vigor) with good nutrition.

इस मानव जीवन की रणभूमि में वह परमपिता परमेश्वर हमें और हमारे परिवारों को सुखदायक आवास, आहार से तृप्त रखे और अनिष्टों से सुरक्षित रखें

सब का धारक धाता, सब का रचयिता ब्रह्मा और सब भुवनों की पालन कर्ता दैवी शक्तियां, अभिमानक शत्रुओं के विनाश में रुद्र और आदित्य अश्विनी देव जजमान को अनिष्ट कारी पाप से बचाएं.

अपनी आत्मा में अग्नि और इन्द्र के स्थापत्य से हम अपने शत्रुओं को नष्ट करें, रुद्र और आदित्य हमारी चेतना मे स्थापित हो कर हमें , उग्र , बुद्धि से संसार मे प्रतिष्ठित पद पर आसीन करें

इंद्र से प्राप्त सामर्थ्य से हम गोधन, सम्पन्नता से युक्त होने के यज्ञ मे प्ररित रहें. हमें हर्यश्व प्राप्त हों हर्यश्‍व‌‌ से अभिप्राय हरिद् वर्णा अश्व बनता है .आज के युग में यह एक बडा नवीन तम वैज्ञानिक उपदेश है, और सचमुच में बडा विस्मयकारी है.
अश्व शक्ति/ ऊर्जा का प्रतीक है हरिद अश्व प्रकृति में तो नही होता परन्तु, इस का अभिप्राय यहां वेद मे green energy से है. जो आज विश्व का आधुनिक तम चिंतन है. जिस को वेदों में कितनी सरलता से ऋषियों ने प्रस्तुत किया है.

subodhkumar धन्यव

subodhkumar
धन्यवाद.