देश पर फूहड़ व नग्न संस्कृति का हमला ?
आज हमारे देश पर एक फूहड़ व नग्न संस्कृति ने हमला कर दिया है | और हमारे लोग बड़ी तादाद में इसकी चपेट में आते जा रहे हैं |
फूहड़ यह इस प्रकार है कि यह उद्देष्यहीन है | इसमें किसी भी प्रकार का लक्ष्य दृष्टिगोचर नहीं होता सिवाय इसके कि कुछ फूहड़पन किया जाए और अधिक से अधिक देश की जनसंख्या को उसमें ही लपेट दिया जाए | इसका कोई समय नहीं है और न ही इसमें कोई समय सीमा है | न इसमें सीमाओं के बन्धन हैं, इसमें सारी सीमाएँ कभी भी लाँघी जा सकती हैं | इस संस्कृति को इससे होने वाले किसी भी हानि या लाभ से कोई वास्ता नहीं है | आपको अथवा आपकी सन्तान को इनकी फूहड़ बातें सुन सुन कर क्या क्या गन्दी आदतें पड़ सकती हैं इससे इनको कोई सरोकार नहीं है, न ही ये इसकी जिम्मेदारी लेती हैं | फूहड़पने का अर्थ हुआ कि समाज के ढाँचे को जैसे चाहें चरमरा दें, मोड़ दें, तोड़ दें, इसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है |
तो फर्क किसको पड़ रहा है ? फर्क पड़ रहा है हमारे बौद्धिक दृष्टिकोण को, हमारी मानसिकता को, हमारे आचरण को, हमारे व्यवहार को, हमारी इच्छाओं को, हमारी नैतिकता को, हमारी भलमनसाहत को, हमारे व्यवहार की शुचिता को, जो सभी कुछ दूषित होता जा रहा है | संक्रमित होता जा रहा है | एक वायरस की भाँती यह सारे देश पर छाती जा रही है | अमरबेल की तरह यह सारे हरे भरे पेड़ों पर सवार होकर उनका अन्न भोजन सब बर्बाद कर रही है | पेड़ों के अस्तित्व को ही खतरे में डाल रही है | उन्हें सत्वहीन बना रही है | यह नग्न संस्कृति है, इसमें केवल नग्नता ही का प्रदर्शन है | सत्य से यह कोसों दूर है |
भारत ऐसी संस्कृति के प्रभाव से हजारों वर्षों के प्रताड़न के पश्चात भी बचा रहा, पर अब वह टूटने के कगार पर है | आखिर कब तक वह लड़खड़ाता हुआ खड़ा रह सकेगा ? क्या यहाँ कै बौद्धिक ज्ञान में कोई छिद्र हो गया है, जैसे कि धरती की ओजोन् लेयर में जिसके कारण हम अवाञ्छित सूर्य किरणों से अपने आप को सुरक्षित नहीं रख पा रहे हैं ? शायद कुछ ऐसा ही हुआ है |
तो आइये अपनी संस्कृति की ओजोन लेयर में हुए छिद्रों को पाटने का कार्य फिर से आरम्भ करें | कहीं ऐसा न हो कि बहुत देर हो जाए |