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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

अध्यात्म अनुभव‌

ओउम् !
श्रृण्वे वृष्टेरिव‌ स्वन: पवमानस्य शुष्मिण: |
चरन्ति विदयुतो दिवि ||
सामवेद उत्त‌रार्चिक 5.1.3.3 (894)

शब्दार्थ:

शुष्मिण: = पाप ताप को सुखा देने वाले महाबली
पवमानस्य = सबके शोधक , शान्तिदायक , भगवान का
स्वन: = शब्द , आदेश
वृष्टे + इव = वृष्टि के शब्द की भाँति
श्रृण्वे = सुनाई दे रहा है
दिवि = प्रकाशाधार मस्तिष्क में
विद्युत: = बिजलियाँ , प्रकाश की झलकें
चरन्ति = विचर रही हैं
पाप ताप को सुखा देने वाले महाबली सबके शोधक , शान्तिदायक , भगवान का शब्द , आदेश वृष्टि के शब्द की भाँति
सुनाई दे रहा है और‌ प्रकाशाधार मस्तिष्क में बिजलियाँ , प्रकाश की झलकें विचर रही हैं |

(स्वामीवेदानन्द तीर्थ सरस्वती)

व्याख्या:

साधक की साधना जब परिपक्व हो जाती है, तब उसे जो अनुभव होता है , उसकी संकेत मात्र चर्चा यहाँ है |सामवेद सारा का सारा आध्यात्मिक्ता की विविध अनुभूतियों से ओतप्रोत है |उपासना की सभी भूमियाँ उसमे दर्शायी गई हैं | इस मन्त्र में भी साधक को जो प्रत्य‌क्ष अनुभव होता है , उसका वर्णन है |
भगवान साधारण जन और असाधारण गण्यजन सभी को सदा उपदेश देते हैं , किन्तु उसको अधिक जन अनसुना कर देते हैं | कोई विरला ही उसे सुनने का यत्न करता है | साधना का मार्ग खुल गया , इसकी सूचना इसी से होती है कि साधक भगवान के विमल उपदेश को सुने | जिसे सुनाई देता है वही कह सकता है ‍

श्रृण्वे वृष्टेरिव‌ स्वन: पवमानस्य शुष्मिण: |
पाप ताप ने झुलस दिया है , आत्मा अशान्त हो उठा है | गर्मी के प्रचण्ड ताप को वृष्टि ही कम कर सकती है |साधक कहता है- मुझे वृष्टि का सा शब्द सुनाई देता है |धर्म्ममेध समाधी के समय वृष्टि का ही शब्द सुनाई देना चाहिए | उस धर्म्ममेध की वृष्टि से अधर्म्म से पैदा हुई स‌ब जलन शान्त हो जाती है ; झुलस से उत्पन्न सब कालिमा धुल जाती है |
मेघ के साथ‌ बिजली भी आती है , इसलिए कहा है‍

चरन्ति विद्युतो दिवि |
आकाश में बिजलियाँ चमक रही है |
सचमुच में इस शरीराकाश में साधक को विद्युत के दर्शन होते हैं | योगी श्वेताश्वतरजी कहते हैं ‍
नीहारधूमार्कानलानिलानां खद्योतविद्युत्स्फटिकशशीनाम् |
एतानि रूपाणि पुर:सराणि ब्रह्मण्यभिव्यक्तिकराणि योगे | श्वेताश्वतरौपनिषद् 2.11

कोहरा , धुआँ , सूर्य , आग , हवा , खद्योत , विद्युत = बिजली ,बिल्लोर और चन्द्र के से रूप आगे आते हैं , जब ब्रह्मयोग का अनुष्ठान किया जाता है | वेद के विद्युत को इनका उपलक्षण समझा जा सकता है | बाहर की बिजली आँख बन्द कराती है , यह बिजली आँख खोल देती है , मस्त कर देती है | अनुभव की बात को शब्दों से कौन समझाए ? भगवान ने थोड़े से शब्दों द्वारा कहना उचित समझा , तो मर्त्य कैसे वाणी की ग्लानी का सामान करे |