यज्ञ

महर्षि ने जहां भी यज्ञों के बारे में आदेश दिये हैं अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेध पर्यंत यज्ञों का विधान किया है.
वेदों मे कर्म और यज्ञ लगभग पर्यायवाची के रूप से मिलते हैं.सायण ने तो कर्म का अर्थ यज्ञ और यज्ञ का अर्थ कर्म तक किया है.
कर्म और कर्मफल के पीछे दिखायी देने वाली अनादि एवं अनंत व्यवस्था यज्ञ में भी चरितार्थ होती है. यज्ञ का एक निश्चित विधान है. यज्ञ का फल भी निश्चित है. जिन कामनाओं से यज्ञ किया जाता है, यजमान की वे कामनाएं सचमुच पूर्ण होती हैं. यजमान के लिए प्रार्थना भी की जाती है " सत्या सन्तु यजमानस्य कामा:"
ऋग्वेद में कहीं भी निष्काम कर्म के स्पष्ट सन्केत इसी प्रकार नहीं मिलते जैसे "मोक्ष" के भी कहीं स्पष्ट संकेत नहीं मिलते. ऋग्वेद तो मनुष्य को सदैव कर्मठ और यज्ञमय देखना चाहता है.
यह संसार का महादुर्भाग्य था कि संसार का कल्याण करने हेतु पुण्य देवांत्मा महर्षि का पार्थिव आस्तित्व इतना संक्षिप्त रहा..परंतु आज उन के दिखाए मार्ग पर अनुसंधान कर के प्रगति करना आर्यों का मूल दायित्व बन जाता है.
महर्षि के देन पञ्चमहायज्ञ से अश्वमेध तक का विषय अछूता सा लगता है.
इसी ओर आर्य मित्रों के योगदान की आशा मे इस यज्ञ विषय स्तम्भ को आरम्भ करने का प्रस्ताव रखने का प्रयास किया जा रहा है. आशा है विद्वत जन बिना किसी पूर्वाग्रह के इस विचार यज्ञ मे अपना योगदान करेंगे.
पहली कडी मे सामयिक विषय पर्यावरण को ले कर एक प्रस्तुति है.

पर्यावरण यज्ञ
Yagya / Prayer for Environments

अथर्व वेद 5/9 ऋषि , ब्रह्मा ! देवता , वास्तोष्पति:

1.दिवे स्वाहा, इदम् दिवे इदन्न मम !
2.पृथिव्यै स्वाहा, इदम् पृथिवै इदन्न मम !
3.अन्तरिक्षाय स्वाहा, इदम् अन्तरिक्षाय इदन्न मम !
4.अन्तरिक्षाय स्वाहा, इदम् अन्तरिक्षाय इदन्न मम !
5.दिवे स्वाहा, इदम् दिवे इदन्न मम !
6.पृथिव्यै स्वाहा, इदम् पृथिवै इदन्न मम !
7.सूर्यो मे चक्षुर्वात: प्राणो3न्तरिक्षमात्मा पृथिवी शरीरम् !
अस्तृतोनामाहमयमस्मि स आत्मानं नि दधे द्यावापृथिवीभ्यां
गोपीथाय स्वाहा, इदम् वास्तोष्पतये इदन्न मम !!

( मे चक्षु: सूर्य ) मेरे नेत्र सूर्य हैं सूर्य से प्रकाश प्राप्त होने से ही देखने में समर्थ होते हैं !(प्राण: वात: ) वायु की ही सत्ता से प्राण विद्यमान रहते हैं ! (आत्मा अन्तरिक्षम् ) आत्मा में अन्तरिक्ष व्याप्त है ! ( शरीरम् पृथिवी) मेरा शरीर पृथिवी से उत्पन्न अन्न जल आदि से बना है ! (अस्तृत: नाम अयं अहं अस्मि ) स्वयम् में मै अनाच्छदित निर्वस्त्र हूं ! (स:) वह मैं ! (गोपीथाय) सब की सुरक्षा के लिए (द्यावा पृथिवीभ्यां) पिता एवं माता रूप इन दोनों द्यावा पृथिवी के प्रति (आत्मानं निदधे) अपने को समर्पित करता हूं !

8.उदायुरुद् बलमुत् कृतमुत् कृत्यामुन्मनीषामुदिन्द्रियम्!
आयुष्कृदायुष्पत्नी स्वधावन्तौ गोपा मे स्तं गोपायतं मा !
आत्मसदौ मे स्तं मा मा हिंसिष्टम् !!

( आयु: उत् ) मेरी आयु उत्कर्ष को प्राप्त हो ! ( बलं उत् )
बल की वृद्धि हो! (कृतं उत् ) कार्य उन्नत हों! (कृत्यां उत्) कार्य करने की क्षमता उत्तम हो ! (मनीषां उत्) बुद्धि को उन्नत बनाओ ! ( इन्द्रियम् उत्) इन्द्रिय समूह उत्कृष्ट हो ! (आयुष्कृद् ) आयु की वृद्धि करनेवाला यह द्युलोक सूर्य और
(आयुष्पत्नी) आयु का पालन करने वाली यह पृथिवी माता (स्वधावन्तौ) स्वयम् में शोभनीय अन्न जल आदि से परिपूर्ण हो कर ( मा गोपायताम् ) दोनों मेरी रक्षा करें ! ( मे आत्म सदौ स्तं) मेरी आत्मा में निवास करें ! (मा) मुझे, (मा हिंसिष्टम् ) मेरी हिंसा न करें !!

आपका आर्य

आपका आर्य मित्रों के योगदान की आशा मे इस यज्ञ विषय स्तम्भ को आरम्भ करने का प्रस्ताव अत्यन्त सराहनीय है | क्या हम अपेक्षा कर सकते हैं कि इसमें अन्य विद्वतगण उचित योगदान करेंगे ।

अन्त में दिये दो वेद मन्त्रों के अर्थ पर्यावरण के साथ हमारी अभिन्नता को किस सरलता से प्रकट करते हैं यह अद्‍भुत हैं |

मेरे नेत्र सूर्य हैं सूर्य से प्रकाश प्राप्त होने से ही देखने में समर्थ होते हैं वायु की ही सत्ता से प्राण विद्यमान रहते हैं ! आत्मा में अन्तरिक्ष व्याप्त है ! मेरा शरीर पृथिवी से उत्पन्न अन्न जल आदि से बना है ! स्वयम् में मै अनाच्छदित निर्वस्त्र हूं ! वह मैं ! सब की सुरक्षा के लिए पिता एवं माता रूप इन दोनों द्यावा पृथिवी के प्रति अपने को समर्पित करता हूं !

मेरी आयु उत्कर्ष को प्राप्त हो ! बल की वृद्धि हो! कार्य उन्नत हों! कार्य करने की क्षमता उत्तम हो ! बुद्धि को उन्नत बनाओ ! इन्द्रिय समूह उत्कृष्ट हो ! आयु की वृद्धि करनेवाला यह द्युलोक सूर्य और आयु का पालन करने वाली यह पृथिवी माता स्वयम् में शोभनीय अन्न जल आदि से परिपूर्ण हो कर दोनों मेरी रक्षा करें ! मेरी आत्मा में निवास करें ! मुझे, मेरी हिंसा न करें !!

मैं स्वयं तो इससे अपने को बहुत लाभान्वित पाता हूँ | आपका बहुत बहुत धन्यवाद |
आनन्द‌

यज्ञ की

यज्ञ की परिभाषा स्वामी दयानन्द ने स्वमन्तव्यामन्तव्य प्रकाश तथा आर्योदेश्यरत्नमाला मेँ दी है| वही माननीय है|

यज्ञ के प्रति श्रद्धा एवम् विश्वास होना आवश्यक है| और साथ में यह भी सुनिश्चित करना अति आवश्यक है कि उससे प्राप्त होने वाले फल के बारें में विवेक से काम लिया जाय| अन्धविश्वास यहाँ भी उत्पन्न हो सकते हैँ|

यज्ञ के केवल सम्भव फल में ही श्रद्धा एवम् विश्वास होना चाहिए, असम्भव फल में श्रद्धा रखना मूढता या अन्धविश्वास है |

ऋग्वेद तथा अन्य वेदों मेँ निष्काम कर्मों ही को श्रेष्ठ कहा गया है| विशुद्ध विद्या, निष्काम कर्म तथा विशुद्ध उपासना को मुक्ति के साधन कहा गया हैं|

= भावेश मेरजा

संपूर्ण

संपूर्ण पर्यावरण अर्थात् पृथिवी, जल, वायु, आकाश व ब्रह्माण्ड‌ के साथ हमारे तन का कितना सम्बन्ध है या यूँ कहिये कि तन और पर्यावरण में कोई भेद ही नहीं है, भेद है तो आत्मा या जीव और प्रकृति में है | ऐसा उपदेश इस मन्त्र से सहजता से मिलता है | यदि हम इसे समझ लें तो हम पर्यावरण के साथ कभी खिलवाड़ करने के बारे में सोचेंगे भी नहीं |

Hindi typing

English

Hinglish Typewriter
see map


Hindi Typewriter
(Mangal font) see map

Krutidev Typewriter
see map

If you see square boxes and don't see Hindi when you type, then click here.

English to Hindi dictionary