शिवरात्री एक आई जग में धूम मचाई
शिवरात्री एक आई , जग में धूम मचाई
पूजन करके शिव का, रात अलख जगाई
रात अलख जगाई
अलख जगी उसमें, चाहत शिव की जिसमें
मूलशंकर था बालक, प्रभु ने राह दिखाई
चिँगारी सी मन में, उसके आन लगाई
शिवरात्री एक आई, जग में धूम मचाई
खेल नियती ने खेला, मन में शोले भड़के
भगिनी चल दी अचानक, देकर जग को बिदाई
मूल शंकर की आखें पर न थीं डबडबाई
देखा टकटकी लगा के, उसने बहना को जाते
अब चाचा भी प्यारा, तज जग को चल दिया
उसने ऐसा रुलाया, मूल जग से फिर नाता
अपना जोड़ न पाया
मृत्यु क्या है, क्या जीवन, कैसे मृत्यु से तरना
दिल में उसके प्रभु ने, आग ऐसी लगाई
माता पिता थे उदास, कैसे बाँधें इसके हाथ
बेटा भाग न जाए, कर दी ब्याह की तैयारी
थक गये करके यतन, न माना मूला का मन
छोड़ माता पिता को, राह जंगल की थामी
खोज शिव की वह निकला, मन में तड़प ले भारी
शिवरात्री एक आई जग में धूम मचाई
बड़ा हुआ ब्रह्मचारी, छान जँगलों की खाक
बन सन्यासी दयानन्द, ज्ञान की खोज की भारी
घोर तपों में उसने, खुद को खूब तपाया
खोज ज्ञान की लेकिन, वह छोड़ ना पाया
मिले अन्त में उसको, गुरू विरजानन्द
जिसने सत्य की खोज, की राह बताई
तपते घड़े को उसने, फिर और तपाया
ऐसे सन्यासी पद से, बना ऋषि दयानन्द
वेदों की महिमा को जिसने, फिर से लौटाया
अज्ञान, पाखण्ड भरी धरती पर, ज्ञान का झण्डा फहराया
शिवरात्री की रात जगकर, जग को जगाया
सच्चे शिव को खुद पाया, सारे जग को समझाया
ऐसे ऋषि को पाकर, जग ने धूम मचाई थी
शिवरात्री एक आई थी, ऐसे ऋषिवर को लाई थी ||
