Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महर्षि दयानन्द कृत आर्याभिविनयः से (49)

***ओउम्***

प्रार्थना विषय

मा नो वधीरिन्द्र मा परा दा
मा नः प्रिया भोजनानि प्र मोषीः |
आण्डा मा नो मघवञ्छक निर्भेन्
मा नः पात्रा भेत्सहजानुषाणि ||49||
ऋ. 1|7|19|8||

हे इन्द्र परमैश्‍व‌र्ययुक्‍तेश्‍वर ! "मा, नो, वधीः" हमारा वध मत कर अर्थात् अपने से अलग हमको न गिरावै | "मा परा दाः" हमसे अलग आप कभी मत हो "मा नः प्रियाः" हमारे प्रिय भोगों को मत चोर और चोरवावै | "आण्डा मा." हमारे गर्भों का विदारण मत कर | हे "मघवन्" सर्वशक्तिमन् ! "शक्र" समर्थ हमारे पुत्रों का विदारण मत कर | "मा नः , पात्रा" हमारे भोजनाद्यर्थ सुवर्णादि पात्रों को हमसे अलग मत कर | "सहजानुषाणि" जो-जो हमारे सहज अनुषक्त स्वभाव से अनुकूल मित्र हैं, उनको आप नष्‍ट मत करो अर्थात् कृपा करके पूर्वोक्त सब पदार्थों की यथावत् रक्षा करो ||49||

From MAHARSHI DAYANAND SARASWATI's 'ARYABHIVINAY'

subodhkumar

subodhkumar
साधारण वेद अनुरागी आर्य मित्रों को यह जान कारी कम होती है कि ऋग्वेद मंत्रो का विभाजन दो प्रकार से होता है. अष्टक और मंडल के आधार पर .
खिल सूक्तों को छड कर ऋग्वेद में ,10589 मंत्र है. हर अष्टक में आठ आठ अध्याय होते हैं. हर अध्याय मे ऋषि देवता के अनुसार कम या ज़्यादा मंत्र होते हैं. महर्षि ने तो ऋग्वेद का अष्टक मे विभाजन संदर्भ अपनाया था,
परंतु साधारण तौर पर ऋग्वेद को दस मंडलों मे विभाजित किया जाता है. हर मंडल ऋषियों देवताऑ के अनुसार भिन्न भिन्न सूक्तों मे विभाजित किया जाता है .
आर्य भिविनय से किया यह मंत्र अष्टक विभाजन के अनुसार 1/18/7 है. परंतु मंडल के अनुसार यह मंत्र ऋग्वेद का 1/104/8 वां मंत्र है.,
मा नो वधीरिन्द्र मा परा दा
मा नः प्रिया भोजनानि प्र मोषीः |
आण्डा मा नो मघवञ्छक निर्भेन्
मा नः पात्रा भेत्सहजानुषाणि |!

आर्याभिवि

आर्याभिविनय में मन्त्र संख्या में अष्‍टक, अध्याय, वर्ग व मन्त्र संख्या का उल्लेख है और इस प्रकार यह संख्या 1|7|19|8 दी गयी है | आपने अष्‍टक अनुसार संख्या 1/18/7 दी है | यह अन्तर क्यों हैं तथा मंडल अनुसार यह संख्या 1/104/8 दी है, क्या इनका आपस में तालमेल जानने का कोई सूत्र है ? कृप्‍या यह जानकारी दें | और विस्तृत उल्लेख भी लाभकारी होगा |
ऐसी उत्तम जानकारी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद |
आनन्द‌

subodhkumar क्षमा

subodhkumar
क्षमा कीजिएगा. मेरी जान कारी इस विषय में बडी सीमित है. चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान द्वारा प्रकाशित ऋग्वेद संहिता (मूल मात्र) मे अष्टक और मंडल दोनो हर एक पृष्ट पर दिए मिलते है.
सार्वदेशिक सभा द्वारा प्रकाशित ऋग्वेद हिन्दी भाष्य में आरम्भ में ऋग्वेद के अष्ट्क और मंडलों का विवरण मात्र दिया मिलता है. परंतु मंत्र सारे मंडलों के आधार पर दिए हैं.
इस विषय पर अधिक विस्तार से अन्य विद्वान हमारा मार्ग दर्शन करें ऐसी आकांक्षा है.