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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वितटामिन डी और गो दुग्ध्

दूध और विटामिन डी
विटामिन क्या होता है ?
विटामिन वे तत्व हैं जिन के अभाव मे दैनिक जीवन मे हम शरीर द्वारा सब काम ठीक से नही कर पाएंगे. इस लिए यह आवश्यक हो जाता है कि दैनिक आहार से हमे संतुलित मात्रा मे ये सब पदार्थ उपलब्ध हों.विटामिनो को घुलनशीलता के आधार पर, दो श्रेणी में बांटा जाता पानी में घुलनशील जैसे विटामिन बी सी इत्यादि और वसा में घुलनशील जैसे ए, डी, ई, के
होर्मोन क्या होता है ?
होर्मोन वे जैविक रसायनिक संदेश वाहक तत्व हैं जिन का निर्माण शरीर के अंदर ही विभिन्न ग्रन्थियों और कोशिकाओं में होता है . होर्मोन रक्त द्वारा उन गंतव्य कोशिकाओं पर पहुंचाए जाते हैं जहां से उस होर्मोन की मांग आई थी. अपने गंतव्य स्थान पर आगमन के बाद होर्मोन तुरंत शरीर की संरचना के कार्य मे युक्त हो जाते हैं.
विटामिन डी क्या है?`
रसायनिक दृष्टि विटामिन डी दो प्रकार के होते हैं डी2 Ergocalciferol एर्गोकेल्सीफिरोल और डी3 Cholecalciferol कोलेकेसिफिरोल
प्राकृतिक रूप से शरीर मे विटामिन डी3 होता है. जो कोलेस्ट्रोल अथवा 7 डिहाइड्रोकोलेस्ट्रोल से मानव अथवा उच्च जाति के पशुओं के शरीर मे ही सूर्य की किरणों के प्रभाव से बनता है.
जो लोग घरों के अंदर अधिक रहते हैं उन के लिए अपेक्षित मात्रा मे विटामिन डी सुसंस्कृत् आहार आवश्यक हो जाता है . अमेरिका जैसे ठण्डे देश में लोग सूर्य का सेवन कम कर पाते हैं.इस के परिणाम स्वरूप वहां बच्चों में रिकेट (एक पोलिओ जैसा रोग) बहुत पाया जाता था. वैज्ञानिक अनुसंधान से यह पता चला कि यह रोग सूर्य की किरणो से कम सम्पर्क के कारण होता है. इसी लिए पिछली शताब्दी के आरम्भ मे शरीरिक पौष्टिकता और जनता के स्वास्थ्य के हित में अधिकारित तौर पर डी3 को विटामिन का दर्जा दिया गया है. और 1940 से ही अमेरिका मे गाय के डेरी दूध मे अतिरिक्त विटामिन डी को मिलाने के लिए कानून् बनाया गया . जिस के परिणाम स्वरूप अमेरिका मे बच्चों मे Rickets सुखंडीग्रस्त (रिकेट ग्रस्त) बच्चो की सन्ख्या मे 85% तक की कमी देखी गई.
विटामिन डी का महत्व
बिना विटामिन डी के कैल्शियम जैसे खमनिज पदार्थ मानव शरीर कू पाचन द्वारा अह्हर से उपलब्ध नही होते. कैल्शियम मानव शरीर मे पाए जाने वाले खनिज पदार्थो मं 70% होता है, क्योंकि सारा अस्थि पंजर कैल्शियम से बना होता है.
मानव शरीर की हड्डियां, मुख्य रूप से विटामिन डी के ही द्वारा कैल्शियम के सुपाचन से स्वस्थ और मज़बूत बनती हैं. इसी से लिए कैल्शियम की गोली के साथ विटामिन डी अवश्य मिला कर देते हैं. हड्डियों के कमज़ोरी से रजनिवृक्त postmenopausal महिलाओं को अस्थि रोग अधिक होते हैं.
1980 के दशक के बाद केंसर, डायाबिटीज़ , थयरायड और त्वचा के रोग जैसे सोरिअसिस भी विटामिन डी से जोड कर देखे जा रहे हैं.भैंस के दूध मे यद्यपि कैल्शियम तो बहुत होत है परंतु विटामिन डी बहुत कम होता है. इस लिए भैंस के दूध से विटामिन डी की कमी के सारे रोग बढते हैं.. यही गाय के दूध का स्वास्थ्य के लिए महत्व है.

विटामिन डी की व्यक्तिगत आवश्यकता
मानव सभ्यता के विकास के साथ घरों में अंदर रहने के साथ कपडे पहन कर रहना मानव की त्वचा पर सूर्य की किरणों के सीधे सम्पर्क को कम करते हैं. इस प्रकार साधारण रूप से प्राकृतिक विटामिन डी की कमी मानव शरीर मे आहार के द्वारा पूरी करने की आवश्यकता बनती है.
अमेरिका मे ऐसा बताया जाता है कि साधारण रूप से संतुलित आहार के साथ साथ. हाथ मुख इत्यादि शरीर के नंगे भाग को मात्र 10 मिनट प्रति दिन सूर्य के दर्शन शरीर भी विटामिन डी द्वारा शरीर की आवश्यकता के लिए पर्याप्त है. ( भारतीय परम्परा मे दैनिक सूर्य नमस्कार का यही महत्व देखा जा सकता है )
मानव शरीर के लिए विटामिन डी के मुख्य स्रोत
सूर्य के दर्शन के अतिरिक्त, समुद्र की मछलियों मे विटामिन डी की प्रचुर मात्रा पाई जाती है. परंतु शाकाहारियों के लिए, गाय का दूध और उस के बने पदार्थ ही विटामिन डी का एक मात्र स्रोत हैं.
कृत्रिम विटामिन का उत्पादन
दूध मे विटामिन डी बढाने के लिए कृत्रिम विटामिन डी बनाने की आवश्यकता हुई. विदेशों में गाय के आहार और दूध दोनों मे अतिरिक्त विटामिन डी मिलाया जाता है.
How is vitamin D produced commercially for food supplementation?
When the critical importance to human health of a regular dietary access to vitamin D3 was understood (in the 1930's), milk suppliers realized it would be advantageous to their customers' health to market milk which had been supplemented with vitamin D3. Thus there developed in the 1940's, and continues to the present, a large business of industrial production of vitamin D3 used for the supplementation of foods for human consumption: milk (both homogenized and evaporated), some margarine and breads. Since the 1960's vitamin D3 has been used also for the supplementation of farm animal and poultry food. In 1973 in the United States some 290 trillion (290 x 1012) International Units of vitamin D3 was manufactured and sold for over 3 million dollars. This vitamin D3 is the equivalent of approximately 8 tons; [see page 62 of reference (2)].
The commercial production of vitamin D3 is completely dependent on the availability of either 7-dehydrocholesterol or cholesterol. 7-Dehydrocholesterol can be obtained via organic solvent extraction of animal skins (cow, pig or sheep) followed by an extensive purification. Cholesterol typically is extracted from the lanolin of sheep wool and after thorough purification and crystallization can be converted via a laborious chemical synthesis into 7-dehydrocholesterol. It should be appreciated that once chemically pure, crystalline 7-dehydrocholesterol has been obtained, it is impossible to use any chemical or biological tests or procedures to determine the original source (sheep lanolin, pig skin, cow skin, etc.) of the cholesterol or 7-dehydrocholesterol.
Next the crystalline 7-dehydrocholesterol is dissolved in an organic solvent and irradiated with ultraviolet light to carry out the transformation (similar to that which occurs in human and animal skin) to produce vitamin D3. This vitamin D3 is then purified and crystallized further before it is formulated for use in dairy milk and animal feed supplementation. The exact details of the chemical conversion of cholesterol to 7-dehydrocholesterol and the method of large-scale ultraviolet light conversion into vitamin D3 and subsequent purification are closely held topics for which there have been many patents issued (2).
The major producers of vitamin D3 used for milk and other food supplementation are the companies F. Hoffman La Roche, Ltd (Switzerland) and BASF (Germany).
दूध में विटामिन डी कहां से आता है ?
Milk from all lactating animals, including humans, contains vitamin D3 that has been produced photochemically from 7-dehydrocholesterol present in the skin. In cow's milk it has been determined that the concentration of vitamin D3 in milk provided by the cow is roughly 35-70 International Units per quart as determined via biological assay (12) and approximately 50-80 International Units as determined by modern chemical mass spectrometric procedures (13). However these are rather low levels of vitamin D3 from the perspective of providing the 200-400 IU per day as recommended by the Food and Nutrition Board of the Institute of Medicine (9). Accordingly, as discussed above, the business practice of supplementing cows milk with chemically synthesized vitamin D3 was initiated. At the present time almost all milk sold commercially in the United States has 400 IU of chemically synthesized vitamin D3 added per quart. Any vendor of milk for human consumption containing added vitamin D3 is required by the US Food and Drug Administration (FDA) to include a notice on the milk carton label. Usually this label states "400 IU of added vitamin D3". However it is not required by law to indicate either the manufacturer of the added vitamin D3 or the sources of the cholesterol and 7-dehydrocholesterol used for its production.
It is a fact that most milk sold in the US will contain vitamin D3 with two origins. (a) That vitamin D3 made by the cow using sunlight to irradiate 7-dehydrocholesterol present in her skin. (b) That vitamin D3 made by a chemical process and then added to the cow milk as a nutritional supplement. It is simply not possible to distinguish the origins of the two vitamin D3 preparations by any biological or chemical procedure, because they are the same molecular structure. Further, there is no legal requirement for the manufacturer of the vitamin D3 formulated for human food supplementation to specify the animal sources of the precursor molecules that were employed in the synthesis of the D vitamin.
If a "food product" is construed to include a chemically pure substance that is the same in all animal species, then those individuals with strict religious reasons for avoiding food products from a particular species have, in the instance of milk and vitamin D3, a dilemma.