महात्मा नारायण स्वामी जी की कठोपनिषद्' पर टीका - प्रथमा वल्ली (7/7)

(गतांक से आगे)

श्‍वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत्
सर्वेन्द्रियाणाँ जरयन्ति तेजः
अपि सर्व जीवितमल्पमेव
तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ||26||
न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो
लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा |
जीवष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं
वरस्तु मे वरणीयः स एव ||27||

अर्थ - (अन्तक) हे मृत्यु ! (यद्) यह (श्‍वोभावाः) कल ही कल, (मर्त्यस्य) मनुष्य की (सर्वेन्द्रियाणाम्) समस्त इन्द्रियों को (एतत्) इस (तेजः) तेज का (जरयन्ति) नाश कर देती है (सर्वम्) सब (अपि) भी (जीवितम्) जीवन (अल्पज्ञ एव) थोड़ा ही है (इसलिए मनुष्य) (तव, एव) तेरे ही (मृत्यु के ही) (वाहाः) वाहन रहें और (नृत्यु गीते) नाचना-गाना भी (तव) तेरा ही रहा ||26||

(मनुष्यः) मनुष्य (वित्तेन) धन से (न) नहीं (तप‌णीयः) तृप्त होता (चेत्) जो (त्वा) तुझको (अद्राक्ष्म) हमने देखा तो (वित्तम्) धन को (लप्स्यामहे) प्राप्त होंगे |(यावत्) जब तक (त्वम्) तू (ईशिष्यसि) चाहेगा (जीविष्यामः) जावेंगे | इसलिए (मे) मुझको (वरः) वर (तु) तो (सः एव) वह ही (वरणीयः) माँगना है ||27||

व्याख्या - नचिकेता यम के दिये हुए प्रलोभनों में नहीं आया, उसने साफ यम से कह दिया कि जिस वस्तु धनादि से मनुष्य की कभी तृप्ति ही नहीं होनी उसे तुझसे माँग कर मैं क्या करूँगा | इसके सिवाय मनुष्य यदि पूर्ण आयु को भी प्राप्त कर लेवे तब भी तो वह केवल 100 वर्ष का समय, आत्मज्ञान की प्राप्ति के फल की अपेक्षा बहुत थोड़ा है और फिर उस आयु के समाप्‍त‌ होने पर मनुष्यों को मौत के फन्दे में फंसना पड़ता है इसलिए क्यों न वह ज्ञान प्राप्‍त‌ किया जावे जिससे अमरता का जीवन प्राप्त हो सके और वह (नचिकेता) मौत के फंदे से भी छूट सके | मनुस्मृति 2-94 में लिखा है -

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति |
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाSभिवर्धते |

महाभारत में भी (देखो अ. 75-19) यह श्‍लोक आया है राजा ययाति शुक्राचार्य्य के शाप से कहा जाता है कि, बूढ़ा हो गया परन्तु फिर शुक्र की कृपा से उसका बुढ़ापा जवानी में बदल गया और उस (ययाति) ने प्रसिद्ध कथानुसार बहुत वर्षों तक इस नई जवानी का उपभोग किया | अन्त में उसने उपर्युक्‍त वाक्य कह कर प्रकट कर दिया कि "मनुष्य की कामनायें भोग करने से तृप्‍त‌ नहीं होतीं किन्तु जैसे अग्नि की ज्वाला घृत डालने से बढ़ती है इसी प्रकार कामनाएँ भोग करने से और भी अधिक बढ़ जाती हैं | इसलिए नचिकेता ने यम के प्रस्तावित भोगमय जीवन को पसन्द नहीं किया |

अजीर्यताममृतानामुपेत्य‌
जीर्यन्मर्त्यः क्वधः स्थः प्रजानन्|
अभिष्यायन् वर्णरतिप्रमोदा-
नतिदीर्घे जीविते को रमेत ||28||
यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो,
यत्साम्पराये महितिं ब्रूहि नस्तत् |
योSयं वरो गूढमनुप्रविंष्‍टों
नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ||29||

अर्थ - (अजीर्यताम्) बुढ़ापे से जीर्ण न होने वाले (अमृतानाम्) मुक्त पुरुषों को (उपेत्य) प्राप्त होकर (क्वध:स्थः) पृथ्वी के अधोभाग में स्थित (मर्त्यः) मनुष्य (जीर्यन्) शरीर के नाश का अनुभव करता हुआ | (वर्ण) सुन्दर वर्ण (रति) और स्त्री प्रसंग से हुए (प्रमोदान्) सुखों का (अभिध्यायन्) विचार करता हुआ (कः) कौन (प्रजानन्) जानता हुआ (अति) बड़े (दीर्घे) लम्बे (जीविते) जीवन में (रमेत) रमण करे ||28||

(मृत्यो) हे मृत्यु ! (यस्मिन) जिस (विषय) में (इदम्) यह (कि मरने के बाद आत्मा रहता या नहीं ) (विचिकित्सन्ति) सन्देह करते हैं (यत्) जो (महति) महान् (साम्पराये) परमार्थ दशा में (प्राप्त होता है) (तत्) उसको (नःब्रूहि) हमारे लिए कह (यः) जो (अयम) यह (गूमढम्) सूक्ष्म (वरः) वर (अनुप्रविष्‍टः) मेरे मन में समाया हुआ है (तस्मात्) उससे (अन्यम्) भिन्न वर (नचिकेता न वृणीते) नचिकेता नहीं चाहता ||29||

व्याखया - ऐसे ऐसे सूक्ष्म विषयों के जानने वाले दुत्प्राप्य हुआ करते हैं इसलिए यम से नचिकेता ने कहा कि तेरे जैसे आत्मज्ञानी को प्राप्त होकर मैं किसलिए क्षणिक सांसारिक विषयभोग के सुख की इच्छा करूँ | विषय सुख की नि:सारता का प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि कोई भी वस्तु उदाहरण के लिए थोड़ी सी शक्कर, स्वाद लेने के अभिप्राय से , जुबान पर रक्खो, जुबान पर रखते ही उसका स्वाद आ जायगा | अब कोई इस उद्देश्य से कि वह स्वाद बराबर आता रहे, शक्कर को न खाकर जुबान ही पर रक्खा रहने दे तो अब उसका स्वाद नहीं आता हाँ, शक्कर की दूसरी मात्रा को जुबान पर फिर रखने से आवश्य स्वाद आ जायगा परन्तु स्वाद आने के बाद उसी शक्कर को कितनी ही देर जुबान पर रखने से फिर स्वाद नहीं आता | इसीलिए आत्मज्ञानी स्त्री-पुरुष सांसारिक विषय सुख को निस्सार कहते और मानते हैं |

***** || प्रथम वल्ली समाप्त || *****

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