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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेदो में विज्ञान व शिल्पविद्या के रहस्य (23)

नहि त्वा रोदसी उभे ऋघायमाणमिन्वतः |
जेषः स्वर्वत्तीरपः सं गा अस्मभ्यं धूनुहि ||8||
ऋग्वेद 1|10|8||

पदार्थ -

हे, परमेश्‍वर‌ । ये (उभे) दोनों (रोदसी) सूर्य्य और पृथिवी जिस (ऋघायमाणम्) पूजा करने योग्य आपको (नहि) नहीं (इन्दतः) व्याप्त हो सकते, सो आप हम लोगों के लिये (स्वर्वतीः) जिनसे हमको अत्यन्त सुख मिले ऐसे (अपः) कर्मों को (जेषः) विजयपूर्वक प्राप्त करने के लिये हमारे (गाः) इन्द्रियों को (संधूनुहि) अच्छी प्रकार पूर्वोक्‍त कार्य्यों में संयुक्त कीजिये ||8||

भावार्थ -

जब कोई पूछे कि ईश्‍वर कितना बड़ा है, तो उत्तर यह है कि जिसको आकाश आदि बड़े बड़े पदार्थ भी घेर में नहीं ला सकते, क्योंकि वह अनन्त है | इससे सब मनुष्यों को उचित है कि उसी परमात्मा का सेवन उत्तम उत्तम कर्म करने और श्रेष्‍ठ पदार्थों की प्राप्ति के लिये उसी की प्रार्थना करते रहें | जब जिसके गुण और कर्मों की गणना कोई नहीं कर सकता, तो कोई उसके अन्त पाने को समर्थ कैसे हो सकता है ? ||8||

आश्रुत्कर्ण श्रुधी हवं नू चिद्दधिष्‍व मे गिरः |
इन्द्र स्तोममिमं मम कृष्‍वा युजश्चिदन्तरम् ||9||
ऋग्वेद 1|10|9||

पदार्थ -

(आश्रुत्कर्ण) हे निरन्तर श्रवणशक्तिरूप कर्णवाले (इन्द्र) सर्वान्तर्यामि परमेश्‍वर । (चित्) जैसे प्रीति बढ़ानेवाले मित्र अपनी (युजः) सत्य विद्या और उत्तम उत्तम गुणों में युक्‍त होनेवाले मित्र की (गिरः) वाणियों को प्रीति के साथ सुनता है , वैसे ही आप (नु) शीघ्र ही (मे) मेरी (गिरः) स्तुति तथा (हवम्) ग्रहण करने योग्य सत्य वचनों को (श्रुधि) सुनिये | तथा (मम) अर्थात् मेरी (स्तोमम्) स्तुतियों के समूह को (आन्तरम्) अपने ज्ञान के बीच (दधिष्‍व) धारण करके (युजः) अर्थात् पूर्वोक्‍त कामों में उक्‍त प्रकार से युक्त हुए हम लोगों की (अन्तरम्) भीतर की शुद्धि को (कृष्‍व) कीजिये |

भावार्थ -

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है | मनुष्यों को उचित है कि जो सर्वज्ञ जीवों के किये हुए वाणी के व्यवहारों का यथावत् श्रवण करनेहारा सर्वाधार अन्तर्यामि जीव और अन्तःकरण का यथावत् शुद्धि हेतु तथा सब का मित्र ईश्‍वर है, वही एक जानने वा प्रार्थना करने योग्य है ||9||

विद्भा हि त्वा वृषन्तमं वाजेषु हवनश्रुतम् |
वृषन्तमस्य हूमह ऊतिं सहस्त्रसातमाम् ||10|
ऋग्वेद 1|10|10||

पदार्थ -

हे, परमेश्‍वर‌ । हम लोग (वाजेषु) संग्रामों में (हवनश्रुतम्) प्रार्थना को सुनने योग्य और (वृषन्तमम्) अभीष्‍ट कामों के अच्छी प्रकार देने और जाननेवाले (त्वा) आपको (विद् म) जानते हैं , (हि) जिस कारण हम लोग (वृषन्तमस्य) अतिशय करके श्रेष्‍ठ कामों को मेघ के समान वर्षानेवाले (तव) आपकी (सहस्त्रसातमाम्) अच्छी प्रकार अनेक सुखों को देनेवाली जो (ऊतिम्) रक्षा प्राप्ति और विज्ञान है, उनको (हूमहे) अधिक से अधिक मानते हैं ||10||

भावार्थ -

मनुष्यों को सब कामों की सिद्धी देने और युद्ध में शत्रुओं के विजय के हेतु परमेश्‍वर ही देनेवाला है, जिसने इस संसार में सब प्राणियों के सुख के लिये अस‍ख्यात पदार्थ उत्पन्न वा रक्षित किये हैं, तथा उस परमेश्‍वर वा उसकी आज्ञा का आश्रय करके सर्वथा उपाय के साथ अपना व सब मनुष्यों का सब प्रकार से सुख सिद्ध करना चाहिये ||10||

(महर्षि दयानन्द सरस्वती के ऋग्वेदभाष्य पर आधारित एवं संक्षेप में उद्दृत्)
THE SECRETS OF SCIENCE & TECHNOLOGY IN VEDAS (23)
(Based on & Reproduced from Maharshi Dayanand Saraswati's RIGVED BHASHYA)