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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

दौड़कर भगवान् को मिलता हूँ

ओउम् | उपेदह‍ं धनदामप्रतीतं जुष्‍टां न श्येनो वसतिं पतामि |
इन्द्रं नमस्यन्नुपमेभिरकैर्यः स्तोतृभ्यो हव्यो अस्ति यामन् ||
ऋग्वेद 1|33|2

शब्दार्थ -

न......................जिस प्रकार
श्येनः..................श्येनपक्षी=बाज
जुष्‍टाम्................प्रीतिपूर्वक सेवित
वसतिम्...............ठिकाने को (उड़कर जाता है तद्वत्)
अहम्..................मैं
इत्....................भी
धनदाम्...............प्रीतिसाधनों के दाता
अप्रतीतम्.............इन्द्रियों से प्रतीत न होनेवाले,
अप्रति-इतम्..........= अनुपम, अजातशत्रु
इन्द्रम्+उप...........अज्ञाननाशक भगवान् के पास
उपमेभिः..............उपमायोग्य
अर्कैः...................वेदमन्त्रों के द्वारा
नमस्यऩ्..............नमस्कार करता हुआ
पतामि................उड़कर जाता हूँ,
यः.....................जो भगवान्
स्तोतृभ्यः.............स्तोताओं के लिए
यामऩ्.................प्रतिदिन
हव्यः..................पुकारने योग्य
अस्ति.................है |

व्याख्या -

श्येनादि पक्षी किसी वृक्ष पर अपना ठिकाना बना लेते हैं | प्रयोजनवश ठिकाने से बाहर जाते हैं , फिर उड़कर उसी अपने-अपने ठिकाने पर आ जाते हैं | जीवों का ठिकाना परमात्मा है, कहा है - वया इदग्ने अग्नयस्ते अन्ये (ऋ. 1|59|1) - दूसरे अग्नि=जीव, हे परम अग्ने ! तेरे वयः = आश्रित ही हैं | तस्मिञ्छ्यन्ते य उ के च देवाः (अ. 10|7|35) - सभी देव तुझमें ही आश्रित हैं | भगवान् सबसे महान् है, यह समस्त-का-समस्त जगत् उसी के आश्रय रहता है, किन्तु अज्ञान के कारण वैसा समझता नहीं |

संसार में आने से पूर्व उसी परमाश्रय ब्रह्म में ही मैं रहता था, क्योंकि ज‌ब तो प्रकृति से किसी भी प्रकार का मेरा सम्बन्ध नहीं था, मैं ब्रह्मानन्द में निमग्न था | ऋषियों का कहना ऐसा ही है -

"जैसे सासारिक सुख शरीर के आधार पर भोगता है वैसे परमेश्‍वर के आधार से मुक्‍ति के आनन्द को जीव भोगता है | वह मुक्‍त जीव अनन्त व्यापक ब्रह्म में स्वछन्द घूमता - ! " (स.प्र. नवम सम्म्ल्लास) | मुक्त जीव स्थूल शरीर छोड़कर संकल्पमय शरीर से आकाश में परमेश्‍वर में विचरते हैं (स.प्र. नवम सम्म्ल्लास) "शरीररहित मुक्त जीवात्मा ब्रह्म में रहता है |" (स.प्र. नवम सम्म्ल्लास) | "जो ब्रह्म सर्वत्र परिपूर्ण है उसी में अव्याहतगति (अर्थात् उसको कहीं रुकावट नहीं) विज्ञान आनन्दपूर्वक स्वछन्द विचरता है |" (स.प्र. नवम सम्म्ल्लास)| मुक्ति से छूटकर संसार में आया था पुनः मुक्ति के साधन जुटाने | ऋषि कहते हैं - जहाँ भोग, वहाँ रोग‌ (स.प्र. नवम सम्म्ल्लास) |

विरक्‍त भर्तृहरि ने भी कहा - भोगे रोगभयम् भोग में रोग व शोक का भय लगा हुआ है | मैं भोग में फँसकर रोग-शोक के जंजाल में पड़ गया | भूल गया मैं अपने असल ठिकाने को, सच्चे देश को | जब सुध आई स्वदेश की तब - उपेदह‍ं धनदामप्रतीतं जुष्‍टां न श्येनो वसतिं पतामि - मैं श्येन की भाँति अपने प्यारे ठिकाने, इन आँखों से दिखाई न देनेवाले धनदाता के पास उड़कर जाता हूँ | अब तो व्यग्रता है, धीरे धीरे चलने से काम नहीं बनता दीखता, अतः उड़कर जाता हूँ | वह मेरी जुष्‍टां वसति है - अनेक बार प्रेमपूर्वक उस ठिकाने का मैंने सेवन किया है | अब भी वहीं जाउँगा | वहाँ जाने का उपाय - इन्द्रं नमस्यन्नुपमेभिरकैर्यः = उपमायोग्य स्तावक वेदमन्त्रों से उस अज्ञानवारक को नमस्कार करता हुआ उड़ता हूँ | भगवान् को भूलने से भवमय बाधा देता है | उसका स्मरण-चिंतन-ध्यान सब बाधाओं के बाँध तोड़ देता है | वही स्तोतृभ्यो हव्यो अस्ति यामन् इस मार्ग में स्तोताओं के लिए पुकारने योग्य है, दूसरा नहीं; तभी तो उपनिषत् ने कहा - अन्या वाचो विमुञ्चथ‌ (मु. 2|2|5) दूसरी बातें छोड़ो | आओ, दूसरी बातें छोड़ ही दें |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय-सन्दोह से साभार)