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मैं किसी कार्यालय में कार्यरत्त हूँ, पर यह नहीं जानता कि यहाँ मुझे क्या कार्य करने हैं | क्या क्या पाने की चेष्टा करनी है | मैं यह भी नहीं जानता हूँ कि मुझे कब यह कार्यालय छोड़् कर जाना होगा, और मैं इस बात से भी अपने आपको अनभिज्ञ मानता हूँ कि जब मुझे यह कार्यालय छोड़ना होगा तो यहाँ से मैं कुछ भी नहीं ले जा सकूँगा, क्योंकि इस बात पर मुझे विश्‍वास ही नहीं होता कि , ऐसा भी हो सकता है कि मेरी सारी उम्र की कमाई ऐसे ही लावारिस छोड़कर मुझे एक दिन जाना होगा | | इस दुनिया के कार्यालयों से तो जाते समय कोई न कोई उपहार, प्रमाणपत्र साथ में ले जाने के लिए मिल जाता है जबकि आमदनी तो अब यहाँ पर भी सीधी बैंक में ही जमा हो जाती है , परन्तु प्रभु के इस कार्यालय में जिसकी मैं बात कर रहा हूँ, सब कुछ प्रभु के इन्टरनैट के द्वारा ही सम्पन्न होता है | साथ में हमें एक सुई की नोंक के बराबर अथवा उसके हजारवें के भी हजारवें हिस्से के बराबर भी कुछ वस्तु ले जाने की अनुमति नहीं है, न ही उसकी भविष्य में कोई सम्भावना है | सब कुछ यहाँ प्रयोग करो, कार्य करो, फिर खाली हाथ सब कुछ जैसे का वैसा ही छोड़कर चल दो | ऐसे में यह भी सत्य. तो क्या महान सत्य है, कि यहाँ से जाने की बारी किसी की भी, किसी भी क्षण में, बिना बताये आ सकती है, और जब भी आती है ऐसे ही आती है | तो खाली हाथ, नहीं नहीं, हाथ भी साथ में नहीं जाते हैं, तो फिर क्या कहें, खाली अथवा खालमखाली, हम जैसे आए थे वैसे ही वापिस रवाना हो जाएँगे |

जी हाँ बिलकुल वैसे ही जैसे आए थे | हमारा एकाउण्ट का बैलेन्स तो भगवान के इंटरनैट के द्वारा साथ ही साथ , पूरी तत्परता से चलता जाता है और हमें अपने अगले पड़ाव की और पहुँचा देता है, पर हम‌ बिना हाथ पाँव ही वहाँ पहुँचते हैं | वहाँ पहुँच कर नये हाथ पैर तो क्या सब कुछ नया हमें उपलब्ध हो जाता है अर्थात् fully furnished house हमें फिर से मिल जाता है और हम अपनी नई पोस्टिंग का आनन्द लेना आरम्भ कर देते हैं | अब पोस्टिंग कहाँ होती है अथवा होगी, यह तो हमारे एकाउण्ट के बैलेन्स पर निर्भर करता है, और तो हमारे पास या साथ में कुछ भी नहीं है |