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Aryasamaj | कृण्वन्तो विश्वमार्यम्
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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्
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आइये ऋषि से जानें कुछ प्रश्नों के उत्तर - वेदोत्पत्तिविषयः (3)

प्रश्न - ‍ईश्वर ने मनुष्यों को स्वाभाविक ज्ञान दिया है सो सब ग्रन्थों से उत्तम है, क्यो‍कि उसके बिना वेदों के शब्द, अर्थ और सम्बन्ध‌ का ज्ञान कभी नहीं हो सकता | और जब उस ज्ञान की क्रम से वृद्धि होगी, तब मनुष्य लोग विद्यापुस्तकों को भी रच लेंगे, पुनः वेदों की उत्पत्ति ईश्वर से क्यों माननी ?

महात्मा नारायण स्वामी जी की 'केन उपनिषद्' पर टीका (आध्यात्मिक भाष्य) तृतीय खण्डः से (3)

पूर्व अंक से आगे -

इस आख्यायिका में अग्नि वायु जहाँ एक और पंचभूतों के प्रतिनिधि रूप में प्रयुक्त हैं वहाँ दूसरी और उनसे इन्द्रियों की सत्ता भी अभिप्रेत है | अग्नि से चक्षु और वायु से त्वचा का अभिप्राय लिया जाता है | जिस प्रकार पंचभूत न ईश्वर की दी हुई शक्ति के बिना काम करते हैं न उसके जानने का सक्षात साधन ही हो सकते हैं, इसी प्रकार इन्द्रियाँ भी बिना ईश्वर प्रदत्त सामर्थ्य के काम नहीं कर सकती हैं, और न उस‌की प्राप्ति का साधन ही हो सकती हैं |

Am I a Soul ,God or Nature or all in One

I took my body as me at times
Or else took my self as GOD Divine
Thus I swung like a swing
but was never sure
and knew not what I had really been
am I an idol made from clay
who walks and talks

महर्षि दयानन्द कृत आर्याभिविनयः से (27)

प्रार्थना विषय

तन्न इन्द्रो वरुणो मित्रो अग्निराप औषधीर्वनिनो जुषन्त‌|

वेदो में विज्ञान व शिल्पविद्या के रहस्य (2)

अग्निः पूर्वेभिर्ऋषिभिरीडयो नूतनैरुत | स देवाँ एह वक्षति ||2||
ऋग्वेद 1|1|2||

ईश्वरानुग्रह से आत्मदर्शन

ओउम् | न वि जानामि यदिवेदमस्मि निण्यः सन्नद्धो मनसा चरामि |
यदा मागन प्रथमजा ऋतस्यादिद्वाचो अश्नुवे भागमस्याः ||
ऋग्वेद 1|164|37

आइये ऋषि से जानें कुछ प्रश्नों के उत्तर - वेदोत्पत्तिविषयः (2)

प्रश्न - जगत् के रचने में तो ईश्वर के बिना किसी जीव का सामर्थ्य नहीं है,परन्तु जैसे व्याकरणादि शास्त्र रचने में मनुष्यों का सामर्थ्य होता है, वैसे वेदों के रचने में भी जीव का सामर्थ्य हो सकता है ?

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