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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

'रामदेव अभियान'

चलो चलें, अब चलो चलें ! संग करने 'रामदेव अभियान' !

योग सिखाया, जिस ऋषि ने हमको, स्वाभीमान जगाया है

उपदेशकों का गुरु

ओउम् | शतधारमुत्समक्षीयमाणं विपश्चितं पितरं वक्त्वानाम् |
मेळिं मदन्तं पित्रोरूपस्थे तं रोदसी पिपृतं सत्यवाचम् ||

JOYS OF TURNING SEVENTYFIVE IN LIFE

AUM
JOYS OF TURNING SEVENTY FIVE IN LIFE
By Brigadier Chitranjan Sawant,VSM

We are all up and about at the crack of dawn.There is a lot of hustle and bustle in the house. Some souls had left the bed in the Brahma muhurt ,approximately about 4 A.M. to recite the Ved mantras. Afterall it was an important day. I, head of the family, would turn seventy five in life. In the Vedic way of life,it is considered an important landmark because the third phase of life comes to an end and the fourth phase of life culminating in one becoming a centenarian commences. In the varnashram dharma this phase of life is also called the sanyas ashram. Notwithstanding my strong inclination towards taking sanyas and donning the ochre clothes, my wife and children, who are parents of their own children,succeeded in convincing me that my area of activity could still revolve around the basic unit of the human habitat,that is a family. I quite know that my detractors would quote the oft-quoted saying – “the spirit is willing but the flesh is weak.”

आइये ऋषि से जानें कुछ प्रश्नों के उत्तर - वेदोत्पत्तिविषयः (3)

प्रश्न - ‍ईश्वर ने मनुष्यों को स्वाभाविक ज्ञान दिया है सो सब ग्रन्थों से उत्तम है, क्यो‍कि उसके बिना वेदों के शब्द, अर्थ और सम्बन्ध‌ का ज्ञान कभी नहीं हो सकता | और जब उस ज्ञान की क्रम से वृद्धि होगी, तब मनुष्य लोग विद्यापुस्तकों को भी रच लेंगे, पुनः वेदों की उत्पत्ति ईश्वर से क्यों माननी ?

महात्मा नारायण स्वामी जी की 'केन उपनिषद्' पर टीका (आध्यात्मिक भाष्य) तृतीय खण्डः से (3)

पूर्व अंक से आगे -

इस आख्यायिका में अग्नि वायु जहाँ एक और पंचभूतों के प्रतिनिधि रूप में प्रयुक्त हैं वहाँ दूसरी और उनसे इन्द्रियों की सत्ता भी अभिप्रेत है | अग्नि से चक्षु और वायु से त्वचा का अभिप्राय लिया जाता है | जिस प्रकार पंचभूत न ईश्वर की दी हुई शक्ति के बिना काम करते हैं न उसके जानने का सक्षात साधन ही हो सकते हैं, इसी प्रकार इन्द्रियाँ भी बिना ईश्वर प्रदत्त सामर्थ्य के काम नहीं कर सकती हैं, और न उस‌की प्राप्ति का साधन ही हो सकती हैं |

Am I a Soul ,God or Nature or all in One

I took my body as me at times
Or else took my self as GOD Divine
Thus I swung like a swing
but was never sure
and knew not what I had really been
am I an idol made from clay
who walks and talks

महर्षि दयानन्द कृत आर्याभिविनयः से (27)

प्रार्थना विषय

तन्न इन्द्रो वरुणो मित्रो अग्निराप औषधीर्वनिनो जुषन्त‌|

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