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Aryasamaj | कृण्वन्तो विश्वमार्यम्
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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्
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भगवान का ज्ञान तारक

ओउम् | अग्निर्धिया स चेतति केतुर्यज्ञस्य‌ पूर्व्यः |
अर्थं ह्यस्य तरणि ||

भारत में हम क्यों जन्मे ?

किसी भी कार्यालय के समान है इस दुनिया का कार्य | कार्यालय की वर्त्तमान दशा का जिम्मेदार पीछे के अधिकारियों का कार्य है | वर्त्तमान के अधिकारियों की नियुक्ति वर्त्तमान स्थिति को सुधारने की अथवा उसकी प्रगती को आगे ले जाने की होती है | उसे किसी भी कीमत पर पूर्व किये गये कार्यों का न तो श्रेय दिया जाता है न कोई दोष उन कार्यों के लिए उन पर थोपा जाता है, या जा सकता है | आइये इस समानता को ध्यान में रखते हुए, हम इस अपनी दुनिया का निरीक्षण करें |

Life Goes On

Less than 100 years from now our present body was non existant. We got it & it started growing. We fed it and it kept growing like a breath, which we inhale.

हमारा अस्तित्त्व सो वर्ष इधर, अथवा उधर ?

बातें तो हम आज से हजारों,लाखों वर्षों की भी कर लेते हैं, उन पर झगड़ भी लेते हैं, लेकिन सो वर्ष इधर अथवा उधर कर दें तो अपने अस्तित्त्व के बारे में हमारा क्या विचार है, इस पर कोई विचार नहीं करते हैं ? यह दो सो वर्षों का अन्तराल हुआ |

महात्मा नारायण स्वामी जी की 'केन उपनिषद्' पर टीका (आध्यात्मिक भाष्य) तृतीय खण्डः से (1)

ब्रह्म ह देवोभ्यो विजिग्ये, तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त, त ऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयोSस्माकमेवायं महिमेति ||1||

महर्षि दयानन्द कृत आर्याभिविनयः से (25)

प्रार्थना विषय

शं नो भगः शमु नः शंसो अस्तु
शं नः पुरन्धिः शमु सन्तु रायः |
शं नः सत्यस्य सुयमस्य शंसः

फटाफट !

अब मानव के बच्चों को नहीं तड़फना इतना होगा
इस वैज्ञानिक युग में क्या, सबकुछ‌ फटाफट ही करना होगा

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